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भगवान श्री कृष्ण जी की आरती

भगवान श्री कृष्ण जी की आरती

ओ३म् जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे ।

भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे ।

परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी ।

जय रस रास बिहारी जय जय गिरधारी ।

कर कंचन कटि सोहत कानन में बाला ।

मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला ।

दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे ।

गज के फन्द छुड़ाए भव सागर तारे ।

हिरण्यकश्यप संहारे नरसिंह रूप धरे ।

पाहन से प्रभु प्रगटे जन के बीच परे ।

पापी कंस विदारे नल कूबर तारे ।

दामोदर छवि सुन्दर भगतन के प्यारे ।

काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे ।

फन-फन नाचा करते नागन मन मोहे ।

राज्य उग्रसेन पाये माता शोक हरे ।

द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे ।

ओ३म् जय श्री कृष्ण हरे ॥

भगवान श्री कृष्ण जी का परिचय

भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म एक अद्वितीय ऐतिहासिक घटना है, जो हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे यशोदाजी और वासुदेव जी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, जब देवकी और वासुदेव जी को कंस के अत्याचारों से बचाने के लिए अनंत शक्ति ने अवतार लिया। कृष्ण जी का जन्म गोकुल में हुआ, और उनके जीवन के पहले चरणों में उन्हें अनेक चमत्कारी घटनाओं का सामना करना पड़ा, जो उनकी दिव्यता को स्पष्ट करती हैं।

कृष्ण जी का पालन-पोषण गोकुल में हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी माताजी यशोदा और पिता जनक की गोद में पले। वे बचपन से ही अद्भुत कृतियों में संलग्न रहे। अपने शिशु काल में, उन्होंने अनेक लीलाएँ कीं, जैसे बटर चुराना और गोपियों के साथ खेलना। उनके इस मासूमियत भरे व्यवहार ने उन्हें गाँववालों का प्रिय बना दिया। इसके बाद, उन्होंने अपनी तेज बुद्धि और निपुणता से मित्रों और परिवार के बीच एक विशेष स्थान प्राप्त किया।

भगवान कृष्ण की जीवन की प्रारंभिक घटनाएँ न केवल उनके व्यक्तित्व को दर्शाती हैं, बल्कि उनके गहरे आध्यात्मिक संदेश को भी प्रकट करती हैं। वे अपने जीवन के विभिन्न कालों में गोकुल और मथुरा में विभिन्न कार्यों में संलग्न रहे। उनकी उपस्थिति ने न केवल कलियुग में अधर्म का नाश किया, बल्कि उन्होंने प्रेम, भक्ति, और निष्ठा के आदर्शों को भी उजागर किया। श्री कृष्ण जी का जीवन न केवल उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह मानवता के लिए एक अमूल्य धरोहर है।

कृष्ण जी के लीलाएँ

भगवान श्री कृष्ण जी की लीलाएँ उनकी अवतार की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। श्री कृष्ण जी का जन्म मथुरा में हुआ, जहाँ उन्होंने कई अद्भुत कार्य किए। बचपन में ही उन्होंने कई लीलाएँ की, जिनमें सबसे प्रसिद्ध बाल-कृष्ण की लीलाएँ हैं। जब वे छोटे थे, तब उन्होंने नंदगांव की गोपियों के साथ बाल लीला की और अनेकों अद्भुत घटनाएँ घटित कीं। उदाहरण के लिए, उन्होंने गोपियों के लिए माखन चुराने का कार्य किया, जो उनके बाल्यकाल की मस्ती और चैतन्य को व्यक्त करता है।

गोपाल लीला भी श्री कृष्ण जी की लीलाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस लीला के दौरान, उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर गोकुल में गायों की देखभाल की और यमुनानदी में गोताखोरी की। इन घटनाओं के माध्यम से उनका प्रेम, मित्रता और जिज्ञासा प्रकट होती है। गोपाल के रूप में भगवान ने न केवल गायों की रक्षा की, बल्कि वे अपने भक्तों के लिए भी एक सच्चे मित्र बनकर उभरे। उनके इस रूप ने केवल भक्ति को बढ़ावा ही नहीं दिया, बल्कि उन्होंने मानवता के प्रति भी अपने दायित्वों का प्रदर्शन किया।

भगवान श्री कृष्ण जी की लीलाओं में महत्वपूर्ण एक अन्य घटना कंस का वध है। कंस, जो मथुरा का तानाशाह था, ने अपने सगे भाई को मारने की योजना बनाई थी। जब उन्होंने यह जाना कि कृष्ण उनके विनाश के लिए आए हैं, तो उन्होंने अनेक प्रयास किए। लेकिन अंततः, भगवान ने अपने दिव्य शक्ति से कंस को वध करके धर्म की स्थापना की। यह लीला मात्र एक युद्ध नहीं, बल्कि सच्चे न्याय और धर्म की विजय का प्रतीक है। श्री कृष्ण जी की लीलाएँ हमें यह सिखाती हैं कि सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है।

कृष्ण जी का गीता में योगदान

भगवान श्री कृष्ण जी का योगदान भगवत गीता में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। जब अर्जुन युद्धभूमि पर खड़े होकर कंफ्यूजन में थे, उसी समय कृष्ण जी ने उन्हें अपने उपदेशों से गीता का ज्ञान प्रदान किया। यह ज्ञान न केवल अर्जुन के लिए बल्कि समस्त मानवता के लिए एक मार्गदर्शक शक्ति बन गया। उन्होंने अर्जुन को धर्म और पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का महत्व समझाया, जिससे अर्जुन ने आत्म-संदेह को पार कर युद्ध के लिए प्रेरित हुए।

कृष्ण की शिक्षाएँ गीता में केवल सैन्य दृष्टिकोण तक सीमित नहीं हैं; वे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं। उन्होंने कर्म योग, ज्ञान योग और भक्तियोग के माध्यम से समझाया कि किस प्रकार मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” के सिद्धांत के माध्यम से कृष्ण जी ने कर्म और फल के बीच संतुलन स्थापित किया, जिससे अर्जुन को अपने कार्य में संलग्न रहने की प्रेरणा मिली।

भगवत गीता निसंदेह व्यक्ति के जीवन में एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, क्योंकि कृष्ण जी ने न केवल धार्मिक और सामाजिक दायित्वों को समझाया, बल्कि आत्म-ज्ञान और आत्मा के स्थायित्व पर भी जोर दिया। गीता में उनका योगदान मानवता को सही दिशा में ले जाने के लिए अंत तक प्रेरित करता है। विषम परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की कला, जैसे कि कृष्ण जी ने अर्जुन को सिखाई, आज भी हम सभी के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है। इस प्रकार, कृष्ण जी का गीता में योगदान मानव जीवन की जटिलताओं को सरल बनाता है और हमें धर्म, कर्म और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

कृष्ण जी की भक्ति परंपरा

भगवान श्री कृष्ण जी की भक्ति परंपरा भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है। यह परंपरा विभिन्न भक्ति आंदोलनों, संतों, और भक्तों के माध्यम से विकसित हुई है, जिन्होंने कृष्ण जी के प्रति असीम प्रेम और भक्ति का प्रदर्शन किया। भक्ति आंदोलन के तहत, संतों ने भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया, जिससे सामान्य जन से लेकर उच्च वर्ग तक सभी ने कृष्ण की लीलाओं और गुणों की महिमा गाई।

16वीं शताब्दी के मध्य में, संत चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण भक्ति को एक नया मंच प्रदान किया। उनकी शिक्षाओं ने भक्तों को प्रेम और भक्ति के माध्यम से भगवान कृष्ण से जुड़ने की प्रेरणा दी। चैतन्य महाप्रभु ने अपने अनुयायियों को ध्यान और संकीर्तन के माध्यम से कृष्ण द्वार तक पहुँचने की विधि बताई। उनके अनुयायियों में बिष्णु देव, नरसिंह मेहता जैसे संत शामिल थे, जिन्होंने अपने जीवन को कृष्ण के चरणों में समर्पित किया।

कृष्ण भक्ति परंपरा के अंतर्गत अनेक भक्ति गीत भी प्रचलित हुए हैं, जो भक्तों की भावनाओं का स्पष्ट चित्रण करते हैं। ‘हरे कृष्णा’ और ‘जो भजे हरि’ जैसे भक्ति गीत इस परंपरा का अद्भुत उदाहरण हैं। इन गीतों का अर्थ केवल भक्ति में नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन में कृष्ण भगवान की उपासना करना है। भक्तों की कथा और उनकी भक्ति के अद्भुत अनुभवों ने कृष्ण भक्ति को समृद्ध बनाया है।

युवाओं, महिलाओं और समाज के हर वर्ग ने इस भक्ति परंपरा में अपनी भागीदारी निभाई है। आज भी, कृष्ण जी की भक्ति परंपरा विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों, जैसे जन्माष्टमी और राधाष्टमी, के माध्यम से जीवित है। यह समर्पण और प्रेम का प्रतीक है, जो सदियों से भक्तों को जोड़ता आ रहा है।

कृष्ण जी के संग-संग अन्‍य पात्र

भगवान श्री कृष्ण जी के जीवन में कई महत्वपूर्ण पात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें से राधा, सुदामा, बलराम और द्रौपदी प्रमुख हैं। राधा जी का कृष्ण जी के साथ संबंध अद्वितीय और अद्वितीय है। राधा और कृष्ण का प्रेम केवल भक्ति और समर्पण का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता और आत्मा के मिलन का भी प्रतीक है। उनकी प्रेम कहानी ने भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान प्राप्त किया है, जो प्रेम की गहराई और मानवता के प्रति कृष्ण जी के अनुग्रह को दर्शाती है।

सुदामा, जो कि कृष्ण जी के मित्र थे, उनकी कथा भी बहुत प्रसिद्ध है। सुदामा की दीन-हीन स्थिति और कृष्ण जी द्वारा उन्हें अभूतपूर्व समर्पण से धन और मान सम्मान प्रदान करना, मित्रता की उच्चतम मिसाल प्रस्तुत करता है। यह कहानी यह सिखाती है कि सच्चे मित्र ही किसी की कठिनाइयों में साथ देते हैं, और कृष्ण जी ने हमेशा अपने प्रियजनों का साथ दिया।

बलराम, जो कि कृष्ण जी के बड़े भाई हैं, भी उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बलराम की शक्ति और साहस ने कई घटनाओं में कृष्ण जी का सहयोग किया। वे हमेशा अपने भाई के साथ रहे, चाहे वो बुराई का सामना करना हो या अन्याय के खिलाफ लड़ाई। बलराम और कृष्ण जी का भाईचारा दर्शाता है कि कैसे परिवार के समर्थन और प्रेम से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।

द्रौपदी, जो महाभारत की प्रमुख पात्रों में से एक हैं, ने भी कृष्ण जी के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखा है। उनके साथ की गई सहायता और सम्मान ने द्रौपदी का भार कम किया, और यह दर्शाता है कि कृष्ण जी ने हमेशा नारी के सम्मान की रक्षा की। यह सब पात्र मिलकर भगवान कृष्ण जी की कहानियों को संपूर्णता प्रदान करते हैं और यह दर्शाते हैं कि उनके जीवन में सभी भूमिकाओं का एक विशेष महत्व है।

कृष्ण जयंती: त्यौहारों और रिवाजों की चर्चा

कृष्ण जयंती, जिसे जन्माष्टमी भी कहा जाता है, भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण हिन्दू त्यौहार है। यह त्यौहार हर साल श्रावण मास की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस विशेष दिन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है, क्योंकि यह कृष्ण देवता के जीवन और शिक्षाओं को याद करने का अवसर प्रदान करता है। जन्माष्टमी की तैयारी अक्सर भव्य उत्सवों और जश्न के साथ होती है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन शामिल होता है।

इस दिन कई रिवाजों का पालन किया जाता है, जैसे कि उपवास रखना और रात्रि में विशेष पूजा का आयोजन करना। भक्तगण संध्या के समय भगवान श्री कृष्ण की मूर्तियों को स्नान कराते हैं और उन्हें धोती और आभूषण पहनाते हैं। इसके बाद, विशेष पूजा सामग्री जैसे कि फल, मिठाइयाँ और फूल अर्पित किए जाते हैं। रात्रि में, भक्त कृष्ण का जन्मोत्सव मनाने के लिए झूले, संगीत और नृत्य का आयोजन करते हैं।

इस त्यौहार की विशेषता यह भी है कि इसे विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जैसे, उत्तर भारत में जन्माष्टमी के दिन घरों में विशेष मिठाइयाँ तैयार की जाती हैं, जिनमें फल एवं दही की विशेषता होती है। दक्षिण भारत में, इस दिन गोवर्धन पूजा तथा अन्य अनुष्ठान भी किए जाते हैं। इसके साथ ही, इस दिन विशेष प्रकार की व्यंजनों की भी तैयारी होती है, जैसे कि ‘पनीर’ से बनी मिठाइयाँ व ‘हलवा’। विभिन्न रिवाजों और परंपराओं के माध्यम से, कृष्ण जयंती न केवल आध्यात्मिक बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक है। इस प्रकार, यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

कृष्ण जी का संदेश और शिक्षाएँ

भगवान श्री कृष्ण जी का जीवन अनेक विपत्तियों और संघर्षों के बीच एक अद्भुत मार्गदर्शन प्रदान करता है। उनके संदेश और शिक्षाएँ आज के युग में भी प्रासंगिक हैं, जो नैतिकता, प्रेम, करुणा, और धर्म के सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रेरित करती हैं। कृष्ण जी ने जीवन के हर पहलू में संतुलन और सच्चाई की आवश्यकता को समझाया है। उनके शिक्षाओं का एक प्रमुख तत्व है ‘धर्म’ का पालन, जो व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उत्कृष्टता की ओर ले जाता है।

कृष्ण जी ने अपने जीवन में प्रेम के स्वरूप को प्रदर्शित किया, यह दिखाते हुए कि प्रेम केवल एक भावना नहीं है, बल्कि एक क्रिया और कर्म है। उन्होंने इस प्रेम का उदाहरण राधा, गोपियों और अपने भक्तों के साथ अपने संबंधों में प्रस्तुत किया। उनका संदेश यह है कि प्रेम में समर्पण और त्याग होता है, और यह मानवता के लिए एक अनमोल मूल्य है। उनके जीवन में करुणा का मामला भी गहरा है; वे सदैव दूसरों की पीड़ा को समझते थे और उनकी मदद करने के लिए तत्पर रहते थे।

साथ ही, धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण बुनियादी नैतिकता और सत्य पर आधारित है। उन्होंने अर्जुन को ‘गीता’ में यह स्पष्ट किया कि अपने कर्तव्यों का पालन करना और सही मार्ग पर चलना ही सच्चा धर्म है। उनके उपदेशों में यह भी छिपा है कि व्यक्ति को परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, बिना किसी स्वार्थ के। इसी प्रकार, कृष्ण जी की शिक्षाएँ आज भी हमें ईमानदारी, निष्कपटता, और दया के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं।

कृष्ण जी की मूर्तियों और चित्रों का महत्व

भगवान श्री कृष्ण जी भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी मूर्तियाँ और चित्र, केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक भी हैं। कृष्ण जी की मूर्तियों को विभिन्न रूपों में बनाया जाता है, जिनमें उनकी बाल लीलाएँ, ग्वालों के साथ क्रियाएँ, तथा राधा के साथ उनकी प्रेम कहानी को दर्शाया जाता है। यह मूर्तियाँ न केवल आस्था को जागृत करती हैं, बल्कि कला और शिल्प का अद्भुत उदाहरण भी प्रस्तुत करती हैं।

कृष्ण जी की मूर्तियों के निर्माण की प्रक्रिया में कई प्रकार की शिल्पकला शामिल होती है, जैसे कि पत्थर की कटाई, काष्ठ शिल्प, और धातु की कलाकारी। हर मूर्ति में एक आत्मा होती है, जो भक्तों के लिए अदृश्य मार्गों से जुड़ती है। इन मूर्तियों का रूप, रंग, और शैली भक्तों के मन-मस्तिष्क में विस्तार से भावनाएँ जगाते हैं। चित्रों की बात करें तो, कृष्ण जी के चित्र में उनके विभिन्न रूपों को देखा जा सकता है, जैसे कि बंसी बजाते हुए, गोपियों के साथ नृत्य करते हुए, या मथुरा में लीलाएँ करते हुए।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, कृष्ण जी की मूर्तियाँ और चित्र भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये केवल पूजा का साधन नहीं हैं, सिवाय इसके, यह कला, संगीत और साहित्य को भी प्रेरित करते हैं। विभिन्न त्यौहारों पर, जैसे कि जन्माष्टमी और होली, इन चित्रों और मूर्तियों की विशेष पूजा की जाती है, जो भक्ति की भावना को और भी मजबूत बनाती है। इस प्रकार, कृष्ण जी की मूर्तियाँ और चित्र न केवल धार्मिक प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण तत्व भी हैं।

समापन: भगवान श्री कृष्ण जी की अनंत महिमा

भगवान श्री कृष्ण जी का जीवन और उनकी महिमा हमें अनगिनत शिक्षाएं प्रदान करती है, जो न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी स्पर्श करती हैं। उन्होंने अपने कार्यों और उपदेशों के माध्यम से भक्ति का वास्तविक अर्थ सिखाया। श्री कृष्ण जी की लीलाएँ, जो दिव्यता और मानवता के पूरक हैं, एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं कि कैसे एक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकता है, साथ ही वह प्रेम और करुणा के संदेश को भी फैलाता है।

जब हम भगवान श्री कृष्ण जी के जीवन को देखते हैं, तो हमें उनकी लीलाओं में न केवल रंग-बिरंगी घटनाएँ दिखाई देती हैं, बल्कि उन घटनाओं के पीछे का गूढ़ अर्थ भी समझ में आता है। उनकी बाल लीलाएँ, जैसे कि मथुरा में माखन चोर की कहानी, हमें यह सिखाती हैं कि जीवन में चुटकी भर खेल और खुशी हमेशा आवश्यक होते हैं। वहीं, गीता के उपदेशों में हमें जीवन के कर्म, धर्म और वास्तविकता का गहन ज्ञान मिलता है।

श्री कृष्ण जी के प्रति भक्ति और श्रद्धा हमारे लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बन चुकी है। उनके अद्भुत कार्यों ने हमें सिखाया है कि सही मार्ग पर चलने से किस प्रकार व्यक्ति को आत्मिक शांति और संतोष मिल सकता है। भक्तों के लिए श्री कृष्ण जी की महिमा केवल एक उपास्य देवता के रूप में नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम, सहयोग और समर्पण के प्रतीक के रूप में भी वर्णित की जाती है। अंत में, श्री कृष्ण जी की अनंत महिमा को समझना और उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में लागू करना किसी भी भक्त के लिए सर्वोपरि है।

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